अस्तित्व की सामाजिक लड़ाई है “विधवा “

Bimal Raturi

ये बात कहने का ख्याल मेरे दिमाग में पहली बार तब आया था जब 2013 में मैंने एक 21 साल की लड़की को देखा जिस ने तीन महीने पहले ही केदारनाथ आपदा में अपना पति खोया था | जो एक सरकारी कार्यक्रम में मुआवजे का चेक लेने देहरादून आई थी और भीड़ में सबसे पीछे बैठ कर अपने पर्स से निकाल कर बिंदी लगा रही थी | अचानक उसका नाम आगे से पुकारा गया उस का हाथ सबसे पहले उस बिंदी पर गया और उसे हटा के आगे सरकारी चेक लेने आगे गयी | मेरे दिमाग में पहला सवाल यही था कि क्यूँ उस ने वो बिंदी हटाई ? क्यूँ वो उस के साथ आगे स्टेज पर या यूँ कहें समाज के सामने क्यूँ नहीं गयी ? मैं ये सवाल उस से नहीं पूछ पाया क्यूंकि उस कार्यक्रम के बाद मैंने उसे नहीं देखा, सच कहूँ तो मैंने उसे खोजा ही नहीं क्यूंकि ये सवाल पचाने में मुझे काफी वक़्त लगा |

अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर दुनिया भर में महिलाओं की उपलब्धियों पर बातचीत हो रही है | हर क्षेत्र में महिलाओं की बढती भागीदारी बढ़ते समाज का एक अच्छा पक्ष हमारे सामने रख रहा है | ऊपर लिखी घटना की छाप मेरे दिमाग में काफी गहरी थी तो मैंने पड़ताल को इस मुद्दे पर केन्द्रित किया | वर्तमान समाज में एकल महिला एक बहुत बड़ा मुद्दा है जिस पे बहुत कुछ आजकल लिखा जा रहा है पर मैं एकल महिला विषय पर सिर्फ और सिर्फ विधवा महिलाओं पर आज भी कोई खुल कर बात नहीं करता |

 महिला अधिकारों पर कई वर्षों से कार्यरत दीपा कौशलम ने बताया कि “अगर बात करें दुनिया की तो सन 2015 की विश्व विधवा रिपोर्ट के अनुसार पूरी दुनिया में विधवाओ की संख्या 258,481,056 बताई है जो की 2010 के मुकाबले 9% अधिक है। उत्तराखंड के आंकड़ों की बात करें तो 2011 में हुई जनगणना के अनुसार 30 से 79 वर्ष तक विधवाओं की संख्या 337295 है | यह आंकड़ा 2011 का है उस के बाद हम केदारनाथ आपदा झेल चुके हैं और भी कई तरह की घटनाओं के हम गवाह हैं जिस से यह आंकड़ा और बढ़ा है |  उत्तराखंड राज्य से काफी लोग सेना में हैं और जो कि सीमा पे शहीद भी होते हैं तो यहाँ पर शहीदों की विधवाओं का भी काफी ज्यादा है |

हमारे समाज में विधवाओं को एक अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता | शास्त्रों में कही बातों के अनुसार उनके पापों की वजह से वो विधवा हुई हैं | विधवा होना सबसे पहले उस की सामाजिक पहचान को ख़त्म करता है क्यूंकि पुरुष प्रधान समाज में उस की पहचान का केंद्र पुरुष है अगर वही ख़त्म हो गया तो कैसी पहचान ? विधवा होना उसकी ज़िन्दगी का हर रंग छीन लेता है | शादी या अन्य कार्यों में होने वाले नाच गाने से उस की उपस्थिति ख़त्म हो जाती है |

राज्य महिला आयोग उत्तराखंड की सचिव रमिन्द्री मन्द्रवाल ने बताया की इस तरह की स्थिति किसी भी महिला को अलग अलग स्तर पर तोड़ देती है जैसे कि भावनात्मक, आर्थिक तथा सपोर्ट सिस्टम | भावनात्मक रूप से देखें तो किसी भी महिला के लिए कठिन होता है इस स्थिति को समझ पाना क्यूंकि बच्चों का भविष्य और खुद का भविष्य उसे धुंधला नज़र आने लगता है | आर्थिक स्थिति बहुत ज्यादा प्रभावित होती है क्यूंकि अधिकतर उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में महिलाएं ज्यादा आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं हैं ऐसे में उन्हें अपनी जरूरतों के लिए आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है | तीसरा मुख्य बिंदु सपोर्ट सिस्टम, उन्हें न सास ससुर से मदद मिल पाती है न और न ही माँ बाप ही अच्छे से सपोर्ट कर पाते हैं | विधवा होना एक तरह से उनके अस्तित्व की ही लड़ाई है | दुबारा शादी का सवाल इतना आसान नहीं है क्यूंकि शादी तो हो ही जाएगी पर सवाल बच्चों का है | क्यूंकि ये असमंजस की स्थिति हमेशा बनी रहती है कि पता नहीं कोई दूसरा आदमी बच्चों को अपनाएगा या नहीं अपनाएगा ऐसी स्थिति में वो अकेले ही रहना ज्यादा सही समझती हैं |

केदारनाथ आपदा के बाद उत्तराखंड के तक़रीबन 150 परिवारों की जनसँख्या वाले चमोली जिले के  देवली भणी गाँव में 50 के करीब विधवाएं हैं | जिसमें 20 के करीब बहुत कम उम्र यानि 25 के करीब है | उनके ही बीच की एक लड़की रचना कपरवाण ने कहा कि मुझे दुःख होता है जब मैं देखती हूँ कि शादी पार्टियों में इन्हें शामिल नहीं होने देते,मेकअप नहीं करने देते | उसने हँसते हुए बताया कि मेरी हम उम्र दोस्त जो कि विधवा है उस के बारे में एक सपना देखा कि उसकी दुबारा शादी हो रही है , पर सच में सपना ही है | मैं चाहती हूँ उन्हें इज्ज़त मिले , वो स्वतंत्र हों किसी एन.जी.ओ के सहारे ज़िन्दगी न काट दें , किसी के दबाव में न आयें | वो अपनी अधूरी जी रही ज़िन्दगी को पूरा जियें कमी जो है उसे भरने की कोशश करें |

उत्तराखंड में एकल महिला के विषयों पर एक ग्रुप “स्वयं सिद्धा” कार्य कर रहा है | “स्वयं सिद्धा” की संचालिका शोभा रतूड़ी ने बताया कि अधिकारों पर बात करना बहुत जरुरी है | विधवा पेंसिन को बढ़ाने की बात सरकार के समक्ष रखी थी जो मुख्यमंत्री ने मानी भी थी | जनसुनवाई हमारा एक तरीका है एकल महिलाओं तक पहुँचने का जिसमें शहर और गाँव की महिलाओं की अलग अलग समस्याओं से हम रूबरू होते हैं |

यह सच में महिला सशक्तिकरण का दुनिया भर में डंका पीटने वाले देश के लिए भयावाह स्थिति है | विधवा महिला को डायन कह देना या पति की मौत के लिए उसे जिम्मेदार ठहराना पूरे भारत में आम है | ऐसी महिला का चरित्र सदा शक के दायरे में डाल दिया जाता है , चाहे वो किसी से भी 2 मिनट बात भी कर ले तो | हमारा समाज काफी दोगला समाज है किसी पुरुष की पत्नी मार जाने पर साल दो साल में हम बच्चों के नाम पर उस की शादी करवाने पर तुल जाते हैं पर उसी स्थिति में जब किसी महिला का पति मरता है तो हम समाज की दुहाईयाँ देने लगते हैं | इस बात से ये बात भी जुडी है कि बच्चों के नाम आदमी की शादी करा कर उसे सेक्स लाइफ को आगे बढ़ाने की छूट है पर हमारे यहाँ महिलाओं को ये छूट या कहें कि सुविधा नहीं है |

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के नजदीक जनजातीय क्षेत्र जौनसार में थोडा नजरिया अलग है | अगर कोई लड़की विधवा हो जाती है तो उसे हीनता से नहीं देखा जाता और अगर वो अपने माँ बाप के घर लौटना चाहे तो उसे पूरे अधिकार मिलते हैं | रहने की जगह खेती बाड़ी के साथ साथ उस के बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी भी उस के नजदीकी रिश्तेदार अच्छे से निभाते हैं | कई अन्य जनजातीय क्षेत्र भी भेदभाव से परे हैं | ऐसे में एक सवाल मेरे मन में आता हैं कि जिन जनजातीय क्षेत्रों को हम पिछड़े हुए और जंगली कहते हैं क्या वो हमारे मुख्य धारा के समाज से सोच में कई सदी आगे नहीं हैं ? जो एक दुर्घटना से किसी की ज़िन्दगी की मुस्कान नहीं छीन लेते |

कोई एक घटना दुर्घटना किसी की ज़िन्दगी की मुस्कान नहीं छीन सकती न रंग छीन सकती है | अपने आसपास हो रही ऐसी घटनाओं पर प्रतिक्रियाएं दें | दुनिया बदलने की पहली कड़ी हम हैं और इस तरह के भेदभाव को हमें ही रोकना होगा |


 

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