इरशाद अनवर

मुस्कराहट एक ऐसी दवा है जो अफ़सोस और निराशा जैसी बिमारियों को भी दूर कर देती है | वो सिर्फ खुद नहीं मुस्कुराती बल्कि दुसरे के लिए भी मुस्कुराने की वजह बन चुकी हैं | हम बात कर रहे हैं उस स्त्री की जो जिंदगी के हर पल को जिन्दादिली से जीती आई हैं, जी हाँ ज्योति धवले सुर्वे |

ज्योति का जन्म 1976 में नाम्कुम्के एक मिलिट्री अस्पताल में  हुआ, उनके पिता भूतपूर्व  ग्रुप कप्तान थे | भारत के अलग अलग क्षत्रों से इन्होंने शिक्षा प्राप्त की | लेकिन बचपन से ही इन्होने खुशियों के चादर को नहीं ओढा था | 3 साल की उम्र में एक दुर्घटना की वजह से उन्होंने अपनी सुनने की क्षमता खो दी | लोगों से बात करते वक़्त वो उनके होठो को पढ़ के अंदाजा लगाती थी और सन्देश तथा विडियो कॉल के ज़रिये ये फ़ोन पे बात करती थी | दुखों के साए ने अपनी परछाई यहीं तक सिमित नहीं रखी | 2005 में चिकित्सकीय लापरवाही की वजह से ज्योति एचआईवी की शिकार हो गयी | ये उन्हें तब पता चला जब वो तीन महीने की गर्भवती थी | बचपन से ही पीड़ा को सर के तकिये की तरह रखने वाली ज्योति एचआईवी पॉजिटिव पता चलने के बाद विश्वास नहीं कर पा रही थी | खुद से जूझ रही ज्योति अब समाज को सोचकर भी जूझने लगीं थी उनको एक सवाल खाए जा रहा था की क्या समाज उनको स्वीकार करेगा ? यह समय 2004-2005 का शुरूआती दौर था जब इस बिमारी के बारे में लोग इतना कुछ नहीं जानते थे और समाज ऐसे लोगों को एक घिन की दृष्टी से देखती थी | समाज के लोग उनसे भेदभाव करने लगे थे और उनके अपने भी उनका साथ छोड़ चुके थे | बिमारी और समाज की अस्विकारिता को झेल रही ज्योति का साथ अब अपनों ने भी छोड़ना शुरू कर दिया था यहाँ तक की उनके पति ने भी जिसके साये की उनको उस कठिन समय में सबसे ज्यादा जरूरत थी | इतनी कठिनाई को सहते-सहते वो अपनी ज़िन्दगी से हार मान चुकी थी और खुद को मिटटी में विलीन करने की सोच चुकी थी | लेकिन अपने बच्चे को उन्होंने जीने की वजह मानकर परिस्तिथियों से लड़ना सिखा | अपनी निजी जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने अपने कदम घर की दहलीज़ से बाहर रखा और नौकरी की तालाश में फिरने लगी | इनके लिए नौकरी मिलना भी इतना आसान नहीं था क्योंकि इन्होने बचपन में ही अपने सुनने की क्षमता खो दी थी | लेकिन यह सब भयानक आंधी की भाँती मुश्किले इनके कदम को रोक नहीं पाए |

इसके बाद इन्टरनेट के माध्यम से एचआईवी की समझ बनाना शुरू किया और जब उन्झे पता चला की ऐसे वो अकेले ही नहीं बल्कि और भी लोग इस बिमारी को झेल रहे हैं | इस सच्चाई ने उनकी राह में एक नया मोड़ ला दिया था | वो मानती हैं की अगर मैं मर जाउंगी तो मेरे जैसे और भी लोग जो पीड़ा झेल रहे हैं वो भी निराश होंगे और उन्होंने ठान लिया की वो जिन्दा रहकर लोगों के लिए कुछ करेंगी | उनका मानना है की अगर मैं अपना चेहरा दिखाकर एचआईवी के लिए लडूं तो समाज के पीड़ित लोगों के लिए भी कुछ कर सकती हूँ |

2011 में ज्योति समाजिक कार्यकर्ता के तौर पर उभर कर आई | ज्योति एचआईवी एड्स से जूझ रहे लोग, एलजीबीटी समुदाय के हक एवं अधिकार के लिए लड़ने वाली महिला और कट्टर सहयोगी भी हैं | इसके साथ ही वह बहुत सारी समाज में हो रहे गतिविधियाँ जैसे मानव अधिकार, मानव तस्करी, सेक्स वर्कर, और बच्चों तथा महिलाओं के स्वास्थय के लिए भी अग्रसर हैं | ज्योति इन्टरनेट के माध्यम तथा लोगों से मिलजुल कर एचआईवी पर परामर्श तथा मार्गदर्शन का काम करती हैं | वह 2012 से बापूजी सेण्टर फॉर एड्स एंड एजुकेशन के साथ क्षेत्रीय संयोजक के तौर पर भी जड़ी हुई हैं | दीप गिरहा सोसाइटी , पुणे के माध्यम से प्रेरक वक्ता के तौर पर वो लोगों तक अपनी प्रेरणा पहुचाने का काम कर रही हैं |

अगर आप मुझे पसंद नहीं करते तो ये मेरी समस्या नहीं है  | जब मैं मेंडिटेशन करती हूँ, तब मेरे अन्दर की आत्मा भगवान् से जुड़ जाती है, उससे मुझे मदद मिलती है शक्ति मिलती है कुछ अच्छा करने की | एचआईवी लोगों से भेदभाव नहीं करता बल्कि लोग भेदभाव करते हैं | हमें आपकी दया, तरस नहीं सिर्फ प्यार चाहिये – ज्योति”

ज्योति मदर टेरेसा और प्रिंसेस डायना को अपना प्रेरणा स्त्रोत मानती हैं | वो अपना बिना किसी शर्त के प्यार करने वाला व्यवहार का श्रेय मदर टेरेसा को देती हैं और लोगो के लिए हमेशा तत्पर रहने वाली आदत का श्रेय प्रिंसेस डायना को बताती हैं |

ज्योति को 2014-2015 में बिना किसी अपने फायदे के समाज की तरफ झुकाव और लोगों का एचआईवी को लेकर मन में बनी कल्पित कथा को दूर करने के एक सफल प्रयास के लिए iCongo REX  की तरफ से करमवीर चक्र से नवाजा गया | इसके साथ ही वह “द स्टिग्मा प्रोजेक्ट” की ट्रेडमार्क राजदूत तथा राइज अप टू एचआईवी कैंपेन का भी चेहरा हैं |ज्योति रंगीलो राइडर्स ऑफ़ रॉयल राजस्थान की भी संस्थापक हैं , जिसका कुछ हिस्सा समाज हित के लिए उपयोग में लिया जाता है |

वो रॉय वाडिया को उनके ज़िन्दगी में  नया पथ प्रदान करने वाला मानती हैं और उन्ही के मार्गदर्शन में अपने कार्य को आगे बढ़ा रही हैं | उनका मानना है की दुनिया में बहुत सारी ऐसी महिलाएं हैं जो मौत के करीब होकर भी ज़िन्दगी जीने की चाह नहीं छोड़ते बल्कि उससे लड़कर जीने की राह बना लेते हैं | उनका ये भी मानना है की अगर लम्बी ज़िन्दगी जीना है तो अपने दिमाग में पल रहे अपंगता को दूर करना होगा |

 

 

 

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