“जैसा मेने सहा है, कोई और न सहे”

Swati Mehrotra

घर एक ऐसी जगह है जहा हम सब खुद को बहुत महफूज़ समझते है | सुरक्षित रहने और आगे बढ़ने के लिये इस दुनिया में ‘परिवार’ सभी की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है। किसी के भी जीवन में परिवार की कई सारी महत्वपूर्ण भूमिकाएँ होती है। माता –पिता हमारे आदर्श और भाई –बहन हमारे सबसे अच्छे  दोस्त | और जो घर का सबसे छोटा हो उसके तो क्या कहने सब उसकी ख्वाइशों को पूरा करते है | और यु ही ज़िन्दगी का पहिया चलता जाता है और फिर उम्र के साथ साथ बचपना कहीं पीछे छूट जाता है और अचानक परिवार में कुछ खुशिया आती है जब घर के बेटे की शादी होती है और एक नया सदस्य(भाभी) हमारे परिवार के साथ आ जुड़ता है |

पर क्या ये टुकड़ा जो अब तक हमसे जुदा था हमारे परिवार में खुद को जोड़ पता है? क्या वह भी हमे इतना स्नेह दे पाता है , जितना आज तक हमे हमारा परिवार देता रहा है ? क्या वो हमारी खुशियों में खुश और गम में उदास होता है? तो शायद हमेशा ऐसा नहीं हो पाता |

ऐसी ही एक कहानी है सिया पारकर की है जिनका जन्म मुंबई में ही हुआ और जो अपने घर में सबसे छोटी और सबसे लाडली थी, बहुत छोटी उम्र में ही उनके  सर से उनके पिता का साया हट गया परन्तु उनके बड़े भाई ने कभी उन्हें एक पिता की कमी का एहसास न होने दिया | उन्होंने अपनी बहन की हर ख्वाइश को पूरा किया | सिया को तयार होने का बहुत शौक था| पर इतनी खुशियों के बीच कुछ तो था जो अच्छा नहीं था और वो था सिया और उनकी भाभी का एक दुसरे के प्रति व्यवहार | निरंतर कोशिशो के बाद भी वह आपसी मतभेदों को सुलझा नहीं पा रहे थे और परिवार भी इसे छोटी छोटी बातें कहकर अकसर नज़रंदाज़ करदिया करता था | “पर एक छोटी सी चिंगारी कब एक ज्वाला का रूप ले ले कोई नहीं कही सकता |” और ऐसा ही हुआ जब एक दिन घर के कुछ आपसी झगड़ो को सुलझाने का प्रयास करते हुए वह स्वयं उस दुर्घटना का एक महत्वपूर्ण किस्सा बन कर रह गई | उनकी भाभी ने गुस्से में आकर पूरा केरोसिन उन पर डाल दिया और सबके सामने ही उन्हें ये कहते हुए जला दिया कि सब तेरी वजह से हुआ है अगर तू न होती तो कुछ बुरा नहीं होता| वो सबके सामने वहा तड़पते –तड़पते बेहोश होगई और जब आँख खुली तो उन्होंने खुद को अस्पताल में पाया|  तीन महीनो तक वह अस्पताल में इस दर्द को झेलती रही, रोती रही , तड़पती रही पर उससे भी ज्यादा अफ़सोस तब हुआ जब उन्हें मालूम हुआ कि उनकी ऐसी दशा करने के लिए जो ज़िम्मेदार है उसे कोई पछतावा नहीं कोई शर्मिंदगी नहीं |

वह अपनी इस दयनीय हालत के लिए अपनी भाभी को सज़ा दिलवाना चाहती थी पर ऐसे समय में उनके परिवार ने भी उनका साथ ये कहते हुए नहीं दिया की तेरी भाभी 2 महीने की गर्भवती है अगर उनको जेल में डाला तो उस नवजात शिशु का क्या होगा? आज इसी वाख्या को याद करते हुए सिया बोलती है कि :

“मेरी माँ ने उसके बारे में सोचा जो अभी इस संसार में आया भी नहीं है पर अपनी बेटी का ख्याल उन्हें एक बार भी नहीं आया जिसकी सांसे तो चल रही है पर वो एक जिंदा लाश बनकर रह गयी है|”

दो साल पहले उनकी माँ का साया भी उनके सर से उठ गया | समाज में निकलकर बहार आना लोगो का सामना करना उनके लिए बहुत मुश्किल था , उनका कहना था की इस सब के बाद कोई नहीं था जिसे वो अपना कह पाती , जिनके पास बैठकर वो रो कर अपना मन हल्का कर लेती | उनकी ऐसी हालत की वजह से वह मानसिक तोर पर भी अस्वस्थ रहने लगी | समाज ने उन्हें सहारा नहीं दिया जब उन्हें सहारे की ज़रूरत थी और न ही उनके अपने परिवार ने |परन्तु “कोशिश करने वालो की कभी हार नहीं होती”, उनका कहना है कि “मनोहर जी जो की आसरा फाउंडेशन से जुड़े हुए है उन्होंने मुझे एक नयी दिशा दिखाई व मुझमे फिर से आत्म –विश्वास पैदा किया यह कहकर कि समाज क्या सोचता है उसे सोचने और बोलने दो , तुम वो करो जो तुम अपने जीवन में करना चाहते हो|” और आज मैं अपने सपनो की नयी सीढ़ी पर चड़ने को तयार हूँ |

सिया हमारे समाज में हो रही घरेलु हिंसा का साक्षात् उदहारण है | परन्तु उनके इस जज़्बे और ज़िन्दादिली को हम शत-शत प्रणाम करते है व आज की युवा पीढ़ी को यह कहना चाहते है कि “ज़ुल्म करना गुनाह है पर ज़ुल्म सहना उससे भी बड़ा गुनाह है|”


 

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